डॉ आलोक चांटिया अखिल भारतीय अधिकार संगठन
पृथ्वी पर कुछ भी नया होना अंदर एक नई ऊर्जा को जन्म देता है चाहे वह जमीन के अंधेरे को तोड़ती हुई नई को पलो के संदेश के साथ बढ़ती हुई लतिका या फिर किसी का नया आगमन चाहे वह ऋतु का वह चाहे साल का हो चाहे समय का हो चाहे जन्म का हो पर इन सब का स्वागत करने का आनंद तभी है जब मन चंगा हो और कहा भी गया है मन मोर चंगा तो कठौती में गंगा पर क्या 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग कांड की तरह हुए नरसंहार की तरह वर्तमान में प्राकृतिक रूप से करो ना जनित नरसंहार किसी के भी मन को चंगा रख रहा है क्योंकि समाज में हम सब संबंधों के जिस जाल में रहते हैं उस जाल के किसी न किसी छोर पर कोई इस दुनिया को छोड़ कर जा रहा है नंगी आंखों से पथराई आंखों से हम चुपचाप मौत की रागिनी को महसूस कर रहे हैं वह बात अलग है की मौत की रागिनी के वशीभूत होकर जो लोग जिंदगी से मुंह मोड़ रहे हैं उनका स्वागत भी शव ग्रह में ढंग से नहीं हो पा रहा है और इसीलिए 13 अप्रैल 1699 में गुरु गोविंद सिंह द्वारा जिस खालसा पंथ की स्थापना हुई थी उसी खालसा पंथ की प्रतिबिंब की आज हर जगह आवश्यकता है ओम देश के मतवालों की आवश्यकता है जो अपने कंधों पर अपनों की लाश को महसूस करें और समाज को बचाने का प्रयास करें जो अपनी जान पर खेलते हुए मानव जीवन को स्थापित करने का योगदान दें शायद ऐसे खालसा हमें गिने-चुने दिखाई भी दे रहे हैं लेकिन वह मौत के तांडव के आगे सिर्फ विनाश का संदेश देने वाले संदेशवाहक ज्यादा बन रहे हैं अतिथि देवो भव संकल्प झूठे साबित हो रहे हैं क्योंकि अस्पतालों के लिए अतिथि के रूप में पहुंचने वाले मरीजों के लिए जगह ही नहीं है उनके स्वागत में प्रस्तुत किए जाने वाली ऑक्सीजन का अभाव है।
ऐसे में जिसे देखिए वहीं सरकार को एक आयोजक के रूप में देखते हुए उंगली उठा रहा है लेकिन क्या सरकार किसी एक व्यक्ति या परिवार की होती है वह तो पूरे राष्ट्र की होती है और राष्ट्र में जब हर 2 सेकेंड पर एक बच्चा पैदा हो रहा है अर्थात 1 घंटे में 25 से 30 बच्चे पैदा हो रहे हैं तो फिर मृत्यु का शोक मनाने की आवश्यकता क्यों और मानव की प्रासंगिकता भी आज की प्रजातांत्रिक मूल्य में जो है वह है उसके द्वारा किए जाने वाले मत का योगदान अब जब हर घंटे पर 25 से 30 बच्चे पैदा हो रहे हैं और बहुत से बच्चे ऐसे होंगे जो साल 2 साल 6 महीना 3 महीना 2 महीने में 18 साल पूरे हो जाएंगे तो फिर प्रजातंत्र में मत के ऊपर तो कोई प्रभाव पड़ ही नहीं रहा है ऐसे में यदि कुछ लोग इस दुनिया में कोरोना के कारण नहीं भी रह जाएंगे तो किसको फर्क पड़ रहा है यही कारण है कि शासन प्रशासन जनता सभी ने गीता का पाठ पढ़ते हुए यह मानकर चुप्पी स्वीकार कर लिया है कि जो आता है वह जाता है यह जीवन नश्वर है मरना निश्चित है और यही कारण है कि हम इस तथ्य पर ज्यादा केंद्रित हैं बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया अगर रुपया हाथ में होगा तो लोगों का इलाज भी हो जाएगा और देश भी चलता रहेगा ऐसी स्थिति में नया साल सब को साल ता है लेकिन कोई कर भी क्या सकता है जिस गीता की ज्ञान के आधार पर लोग मौत की रागिनी के साथ नृत्य कर रहे हैं।
उस गीता के अनुसार जब-जब धर्म की हानि होती है तब तक भगवान जन्म लेते हैं यहां पर यह विचारणीय बिंदु अभी नहीं होना चाहिए कि धर्म की हानि क्या है लेकिन यह निश्चित है कि जब भगवान भी किसी रानी से समाज को बचाने में असमर्थ हो जाते हैं तो भगवान के सारे स्वरूप अपनी शक्तियों को एक कुंज के रूप में स्थापित करके जिस महाशक्ति का निर्माण करते हैं वही दुर्गा हो है और आज मां दुर्गा का दिन इस बात का संकेत है कि मानव ही नहीं भगवान भी संक्रमण के आगे विफल होकर दुर्गा के आगे नतमस्तक हैं लेकिन मां दुर्गा का स्वरूप महिषासुर के मर्दन में कितना समय लेगा और उस महिषासुर को मारने में देव गणों को अपनी आहुति में देनी पड़ेगी उसके लिए हमें तैयार रहना होगा लेकिन यह तैयारी एक कठिन तैयारी है क्योंकि इसमें आहुति का अर्थ छिपा हुआ है इसलिए यह नया साल सबको साल रहा है पता नहीं हम सब जियो और जीने दो के दर्शन को कब वास्तविकता के अर्थ में अपने जीवन में उतारेंगे क्योंकि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम खुद भी जीना चाहते हैं और दूसरे को भी जीने देना चाहते हैं हर व्यक्ति एक डर में जी रहा है और वह डर मनोवैज्ञानिक ज्यादा है हर किसी को कुछ खोने का डर है वह भूख के आगे विवश है और पागलों की तरह सड़कों पर दौड़ रहा है कि कहीं कल वह भूखा ना रह जाए लेकिन इस दौड़ में वह अपने साथ जिस महिषासुर को घर में वापस लेकर आ रहा है उसके लिए उसके घर में दुर्गा की स्थापना नहीं है वह मखाना मूंगफली फलाहारी आलू स्वयं खाकर दुर्गा की उपासना कर रहा है लेकिन महिषासुर जिस वैक्सीन से मर सकता है वह सबके हाथों तक पहुंच जाए यह वरदान यदि वास्तव में दिखाई देने लगे तो नया साल नवरात्र बैसाखी सब कुछ मानव के होने की पुष्टि करने लगेंगे लेकिन मानव को सुषुप्त अवस्था में रहने वाले और ऋतु परिवर्तन में सुसुप्त अवस्था में जाने वाले समस्त जानवरों को अपना आदर्श प्रेरणा मानकर आज उतना ही संयमित जीवन जीना होगा यदि वह जानवरों के इस दर्शन को आज समझ लेंगे तो अगले वर्ष की मां दुर्गा और नए साल का आनंद उस हिमपात के समय में उत्तरी ध्रुव पर सोने वाले भालू की तरह समय बदलने पर फिर वह प्रकृति का आनंद ले पाएंगे पर इसके लिए आज प्रकृति को समझने की आवश्यकता है क्या आप समझ रहे हैं क्या आप जानवर से प्रेरणा लेने को तैयार है या अभी भी आप में मानव होने का गुमान और अभिमान शेष है सूचना आपको है















