अमित मिश्रा ( मुम्बई ब्यूरो चीफ)

 

प्रकाश झा, अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धुलिया हैं आदर्श

कूट-कूटकर भरा टैलेंट, सही रास्ते का मार्गदर्शन और थोड़ा सा लक…बॉलीवुड में कदम रखने और कामयाबी का अपने हिस्से का आसमान पाने के लिए यही मूलमंत्र है. फिर अगर टैलेंट की जगह  मल्टीटैलेंट का कुदरती और मानवी मेहनत का करिश्मा साथ हो, इंसान सही मार्ग से सही दिशा में बढ़ रहा हो और लक भी शबाब पर हो तो बॉलीवुड तो खड़ा ही है बाहें पसारे स्वागत के लिये. मल्टी टैलेंटेड शख्सियत पवन पांडे भी ऐसे ही पॉजिटिव नसीब के ऐसे लकी इंसान हैं जिन्हें बॉलीवुड का प्यार और दुलार भी मिल रहा है तथा भरपूर काम भी .

कानपुर में जन्मे मगर मूलतः उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की पावन धरा सुल्तानपुर की सोंधी मिट्टी की महक को रूह में बसाए अपने ज़िले का नाम रोशन कर रहे पवन पांडे की शिक्षा – दीक्षा सुलतानपुर में ही हुई . बचपन से ही मनोरंजन की दुनिया में  कुछ विशेष कर गुजरने का जिगरा लिए पवन ग्रेजुएशन के बाद लखनऊ चले आये थे.

बता दें कि पवन पांडे के पिता पंडित दीनानाथ पांडे ( अब स्वर्गीय ) देश के ख्यातनाम कवि-गीतकार रहे. उनकी रचनाएँ पवन पांडे के लिए ऊर्जा का काम करती रहीं.

फिल्मों-नाटकों का शौक था ही . पवन गीत भी लिख लेते थे व अच्छा गाते भी थे. स्क्रिप्ट, डायलॉग भी लिखना आता था, साथ ही एक्टिंग में भी वे माहिर थे तो डायरेक्शन भी उनका पैशन रहा. अब इन्हीं खूबियों की सार्थकता सिद्ध करने के लिए वे उतावले होकर लखनऊ में रह रहे थे.

कहावत है कि जितनी ज्यादा दूर तक छलांग लगानी हो तो उतना पीछे हटकर तब आगे दौड़ा जाता है. पवन को भी लगा था कि बॉलीवुड में अपने सपने पूरे करने  हैं तो एक्टिंग के साथ-साथ डायरेक्शन की भी बारीकियाँ सीखनी ही होगी. अपनी अन्य खूबियों को भी पॉलिश करना होगा . यही सोचकर वे लखनऊ आये थे व यहां थियेटर करने लगे थे. एक्टिंग के साथ डायरेक्शन का तज़ुर्बा धीमे-धीमे जवां होने लगा तब रामलीला से लेकर स्टेज शो भी करने लगे. नाम बढ़ने लगा तो लखनऊ से भोपाल आ गए. भोपाल आकर वे डायरेक्शन के क्षेत्र में महारत हासिल कर चुके थे. पर अब भी उनका लक्ष्य बॉलीवुड ही था.

बात उन दिनों की है जब प्रकाश झा फ़िल्म राजनीति बना रहे थे . उसी दौरान पवन भोपाल से मुम्बई आ गये . पवन के अनुसार उनका नसीब अच्छा था कि आते ही दिग्गज मेकर प्रकाश झा के असिस्टेंट बने. फ़िल्म बनी और चली भी खूब. पवन की तरह अन्य कई लोग यहां असिस्टेंट थे. उसी भीड़ में उन्हें अपना नाम कहीं गुम हुआ सा लगा. तब पवन ने तय कर लिया कि अब अपने दम पर अपने लिए ही मेहनत करेंगे.अपनी फिल्म बनाएंगे.

लम्बी जद्दोजहद व अथक प्रयासों से पवन ने तब अपने डायरेक्शन में एक फ़िल्म बनानी शुरू की. फ़िल्म का नाम था ‘रणनीति’. ये फ़िल्म 2016 के अंत में फ़िल्म ‘डियर ज़िंदगी’ के साथ रिलीज हुई थी. इस फ़िल्म ने उन्हें कामयाबी के लिये मंजिल पर बढ़ने का रास्ता दिखा दिया. मील का पत्थर बनकर हौंसला भी दिया कि यहा से अब दूर तक दौड़ते जाना है.

पवन पांडे ने इसके बाद धड़ाधड़ कई शॉर्ट फिल्में बनाईं जैसे कि प्यास, अल्कोहल , टाइम नहीं मिला आदि. इनकी सफलता के बाद पवन ने पुनः फीचर फिल्म की ओर रुख किया. इस बार उन्होंने ‘ रेड लाइन ‘

की मेकिंग शुरु की. पवन के अनुसार राहुल आंजना, हेमंत व्यास, मुस्ताक खान अभिनीत ये फ़िल्म 70 प्रतिशत बनकर तैयार है. लॉक डाउन के कारण शूटिंग रोकनी पड़ी थी. शेष 30 प्रतिशत की शूटिंग वे जल्द करना चाहते हैं. इसमें अनुपम श्याम ओझा जैसे दिग्गज कलाकार से भी अभिनय कराएंगे.

पवन पांडे के अनुसार उनकी फ़िल्म रेड लाइन का गीत-संगीत वाला पक्ष भी बेहद शानदार होगा. उनकी इस फ़िल्म में म्युज़िक अभिषेक पांडे का है व गीत लिखा है ए.आर. कुमार राव व खुद उन्होंने . इस फ़िल्म में कुल पांच गाने हैं. उनकी फ़िल्म के गीतों को स्वर दिया है शाहिद माल्या, देव नेगी, नखास अज़ीज़ व वाणी त्रिपाठी ने. एक गाना खुद उन्होंने भी गाया है.

खैर, उनसे पूछने पर कि बॉलीवुड में आने का अनुभव कैसा रहा तो पवन पांडे ने कहा कि मुझे मल्टीटैलेंटेड होने के कारण बॉलीवुड ने सीने से लगाया है. टैलेंट, संघर्ष, पक्की धुन व सही राह ही यहां आगे ले जाती है.

भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि पहले वे अपनी रुकी फिल्म रेड लाइन की शूटिंग कम्प्लीट करेंगे फिर राजकुमार राव को लेकर फ़िल्म बनाने की उनकी इच्छा है. अंत में पवन पांडे ने कहा कि प्रकाश झा, अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धुलिया मेरे आदर्श हैं. भविष्य में इन्हीं के टाइप की फिल्में बनाता रहूंगा, ऐसी फिल्में जो भेड़चाल से अलग हों.

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