
सलिल पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार, मिर्जापुर.
मिर्जापुर। नवरात्र में कलश-स्थापना को लेकर उलझन में लोग देखे जा रहे हैं। विभिन्न माध्यमों में कलश की स्थापना का अलग-अलग समय बताया जा रहा है। चित्रा नक्षत्र में कलश-स्थापना का निषेध तो है लेकिन अभिजित मुहूर्त में कलश स्थापित किया जा सकता है।
समय
नवरात्र प्रतिपदा, शनिवार को अभिजित मूहुर्त पूर्वाह्न 11:37 बजे से मध्याह्न 12:22 बजे तक है। इसलिए इस मुहूर्त के भीतर कलश-स्थापित कर पूजन किया जा सकता है।
विशेष बात
हमेशा पूजन में मुहूर्त के अंदर पूजन की शुरुआत कर देनी चाहिए। उदाहरण के लिए कोई 12:22 के अंदर कलश स्थापित कर दीपक प्रज्वलित कर दें और आदिशक्ति को आमंत्रित कर दे तो वह पाठ 12:22 के बाद भी करेगा वह उचित है क्योंकि उपासक मां की छत्रछाया में आ गया है और नकारात्मक शक्तियां उसे बाधित नहीं कर सकेंगी। यह जरूरी नहीं कि पाठ 12:22 के अंदर खत्म हो। इस संबन्ध में पुरोहितों से भी वार्ता की गई। ज्योतिषी पं जगदीश द्विवेदी ने भी अपनी राय दी। जो लोग दोपहर चित्रा नक्षत्र के बाद 2:20 बजे के बाद स्थापित करना चाहते हैं, वे भी अपने सुविधानुसार पूजन कर सकते हैं।
कलश स्थापना का सन्देश
कलश मनुष्य के शरीर की तरह है। इसके ऊर्ध्व भाग (उपरी हिस्से) में विष्णु जी की तरह सहस्रार चक्र है। जो कलश में जल की तरह तरंगीय शक्ति को संग्रहित करता है।
कलश के मध्य भाग में भगवान शंकर बताए गए है। यहां विशुद्ध चक्र होता है। यह स्थान थायरॉइड ग्लैंड का है। पूरे शरीर में रस-रसायन का केंद्र है यह स्थल । यह चक्र अनुकूल है तो शरीर में अनुकूलता रहती है वरना जहरीले रस-रसायन का प्रवाह होने लगता है।
कलश के मूलभाग जीवन प्राप्ति का मूल स्थल नाभि है। मणिपुर चक्र है नाभि। यह ब्रह्मा का स्थान है। ब्रह्मा सृजन के देवता है। नाभि सृजन-स्थल है।
कलश में सुपाड़ी और उपर नारियल- यह दृढ़ संकल्पों का सूचक है। सन्देश यह है कि लक्ष्य के लिए भी दृढ़ रहा जाए और चरित्र से भी।
कलश में जल- अंतर्मन में तरलता हो। दूसरों की पीड़ा से मन का जल आंखों में आ जाए वरना कठोर मन स्वयं के लिए घातक होता है।
इस प्रकार कलश-स्थापना के पूर्व तन और मन भी पूजा में बताए गए उपायों को तदनुसार बनाना चाहिए।

















