यह कोई नई घटना नहीं है।नरेंद्र गिरी बड़े पद पर थे तो पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई।संतों की अकूत संपदा ही उनकी बर्बादी का सबब बन गई।इस संत जगत को जो करीब से जानते हैं, उन्हें पता है कि ज्ञानमार्ग के ये पथिक कितने अकेले हैं।

क्यों हैं इसका कारण वे भी जानते हैं और समाज भी। लेकिन समाज पर भक्ति का ऐसा आवरण चढ़ा है कि लोग विराट आश्रमों और मठों के भीतर बसे अंधेरे को देखना ही नहीं चाहते।नरेंद्र गिरी सोसाइड नोट छोड़ गए हैं और काफी कुछ साफ कर गए हैं।पर सवाल हैं कि उठेंगे और उठते रहेंगे !

सच कहें तो सवालों का उठना 60 के दशक में शुरू हो गया था ।यह वह दौर था जब ओशो जैसे अनेक संतों ने भारत की गरीब और पीड़ित जनता को ज्ञान बांटने के बजाय पश्चिम की समृद्धि को ज्ञान देने के लिए चुना था। ओशो हों, बाल योगेश्वर या महेश योगी; योरोप और अमेरिका जाने के पीछे उनके मन में भारी दौलत कमाने की लालसा थी। तब की संतई को लगा कि लोभ मोह और त्याग का संदेश भारत के गरीब समाज को देने से उन्हें कुछ नहीं मिलेगा।

संत बनने के लिए जिस आसक्ति को त्यागना जरूरी है, उसी आसक्ति ने लोभ बनकर संतई के भीतर प्रवेश कर लिया।देखते ही देखते देश की शीर्ष राजनीति संतई की गुलाम बन गई। संतों को ताकत, सत्ता और दौलत का ऐसा चस्का लगा कि ऋषि मुनियों की सारी मीमांसा ही जाती रही। संतों के आश्रम सत्ता पाने का माध्यम बनते चले गए ।

संतों ने अपनी दौलत अपने उस परिवार से बांटनी शुरू कर दी, जिसे छोड़कर वे संन्यस्थ हुए थे । फिर क्या था, संतई के सारे मतलब ही बदल गए। संत सीधे राजनीति में आ गए।वे सांसद , विधायक और मुख्यमंत्री तक बनने लगे । समाज को कुछ देने की बजाय समाज से लेने की होड़ ने संतजगत को हास्यास्पद बना डाला।

आज के संतों में गौतम, कणाद और भास्कर नहीं, रामरहीम, राधे माँ, आसाराम बापू और रामपाल पैदा होने लगे। वैदिक ऋचाओं का गान करने के बजाय, संत डम डम डिगा डिगा गाने लगे। भारत की वनवासी, गिरिवासी बस्तियों में जाकर कथा सुनाने के बजाए दुबई, न्यूयार्क और लन्दन में ज्ञान बांटने लगे।

परिणाम सामने है। तीर्थ नगरों की किसी भी अदालत में चले जाइये, वकीलों के बस्तों पर मोटी मोटी फाइलें लिए बैठे साधु संत नजर आ जाएंगे। कहीं कोई पंखे से लटक रहा होगा, कोई अखाड़े के खजाना लेकर फरार हो चुका होगा और कोई गुरु की हत्या की पैरवी करने आया होगा। यह अब आम बात है।

सच कहें तो शायद कलिकाल का प्रभाव है।भगवा संस्कृति के मायने ही बदल गए हैं। सप्त ऋषियों के ये ज्ञान मंदिर आज दौलत के खजानों में परिवर्तित हो चुके हैं। तो जो हो रहा है, होने दीजिए। अभी बहुत कुछ देखने को तैयार रहिये, शायद नियति भी यही चाहती है।

यदि संत संत ही रहे तभी सनातन की रक्षा होगी।

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