डॉ आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय अधिकार संगठन

 

वैसे तो हर किसी व्यक्ति के सामान्य ज्ञान में मानवाधिकार विधि का क्षेत्र है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न किसी के लिए भी या होना चाहिए कि मानवाधिकार राज्य का विषय है या वहां के रहने वाले नागरिकों का विषय है क्योंकि ज्यादातर स्थितियों में मानवाधिकार के संदर्भ में यह अपेक्षा की जाती है या यह विश्लेषण किया जाता है कि मानव के जीवन को सुनिश्चित करने के लिए राज्य द्वारा बनाए गए नियम विनियम विधि को मानवाधिकार के अंतर्गत रखा जाए लेकिन यही दृष्टि को सामान्य तौर पर पूरे विश्व में स्वीकार किया जाता है पर एक प्राकृतिक नियम यह भी होता है कि पृथ्वी पर पाए जाने वाला प्रत्येक प्राणी अपने जीवन और अस्तित्व को बचाए रखने के लिए प्रकृति से अपने अधिकारों को सुनिश्चित कर आता है जिसके आधार पर पृथ्वी पर पाए जाने वाले समस्त पेड़ पौधों को आनुवांशिक रूप से बहुत से ऐसे प्राप्त हैं जिनके आधार पर वह अपने अस्तित्व और गरिमा को जीवन को बनाए रखने में सफल होते हैं उसी में प्रत्येक प्राणी द्वारा अपने लिए आवास का निर्माण करना है लेकिन संस्कृति के दायरे में जब प्राकृतिक रूप से आवास बनाने की स्थिति के बजाय राज्य की संकल्पना में प्राकृतिक संसाधनों पर नागरिक का कोई अधिकार नहीं रह जाता है उस स्थिति में आवास बनाने का अधिकार एक सीमित अर्थ में नागरिक के पास रहता है इसीलिए जब नागरिकों के लिए आवाज बनाने की स्थिति एक दुरूह कार्य जैसी हो जाती है तो बार राज्य का विषय बन जाती है और वहां पर आवास बनाने का अधिकार राज्य द्वारा सुनिश्चित किया जाता है और आमतौर पर इसे ही मानवाधिकार परिभाषित किया जाता है लेकिन आवास बनाने के प्राकृतिक शरीर की व्यवस्था से संचालित होते हैं।

यह भी एक सत्य है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने शरीर को सुरक्षित रखना चाहता है और इसके लिए वह हर तरह के प्रयास करता है जैसे आवास बनाने की स्थिति ना होने पर राज्य की संकल्पना में प्रत्येक व्यक्ति राज्य से इस बात की मांग करता है कि उसके जीवन को सुरक्षित बनाया जाए लेकिन यह मांग को किया जाना सिर्फ विधि का विषय नहीं है बल्कि मनुष्य के शरीर के अंदर की व रासायनिक क्रियाएं भी हैं जो उसके अंदर उसके प्राण के प्रति एक भय उत्पन्न करती है और यह एक विशिष्ट तरह का हार्मोन एड्रीनलीन इनके कारण होता है जो डर पैदा करता है यही डर खुली अवस्था में अपने प्राणों की सुरक्षा के लिए दौड़ने का भाव प्रेरित करता है लेकिन राष्ट्र राज्य की संकल्पना में यही हार्मोन व्यक्ति को इस मांग के लिए प्रेरित करता है कि सभी के पास आवास होना चाहिए इसलिए सिर्फ यह कह देना कि मानवाधिकार विधि का विषय है एक सम्यक विचारधारा नहीं है बल्कि मानवाधिकार विज्ञान का वह पहलू भी है जो शरीर की रासायनिक क्रियाओं के फलस्वरूप किसी भी व्यक्ति को दो तरह से प्रेरित करता है एक तो प्राकृतिक अवस्था में प्रकृति के प्रति संघर्ष और योग्यतम की उत्तरजीविता के आदर्श के सापेक्ष अपने जीवन जीने के अधिकार को सुनिश्चित करने की प्रेरणा देता है और राष्ट्र राज्य की संकल्पना में इन्हीं रासायनिक क्रियाओं के फल स्वरुप वह राज्य के सामने विरोध करने के स्वर भी उत्पन्न करता है इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है की वर्तमान में चलने वाले किसान आंदोलन में ज्यादातर आंदोलन की स्थिति सिर्फ पंजाब हरियाणा उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रह गई क्योंकि जिन आना जो आया फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर सबसे ज्यादा डर किसानों को लग रहा है वह इन्हीं तीन राज्यों द्वारा पैदा किया जाता है जिसके कारण उन्हें अपना भविष्य स्थिर लगने का डर लग रहा है लेकिन यह दूसरे राज्यों के किसानों को नहीं लग रहा है और इसी डर के कारण किया जाने वाला विरोध उनकी गरिमा को जीवन के सुनिश्चित किए जाने के तथ्य को ज्यादा स्थापित करता है।

यही नहीं कोरोना वैक्सीन के आ जाने के बाद बहुत से लोगों द्वारा शरीर के अंदर की रासायनिक क्रियाओं और डर के कारण यह है कि यह वैक्सीन उन्हें वास्तव में जिंदा रखेगी या उनके जीवन में और संकट उत्पन्न कर देगी इसीलिए इसके प्रति भी एक विरोध के स्वर सुनाई दे रहे जो जीवन जीने के अधिकार का ही परिणाम है इसलिए मानवाधिकार का अध्ययन सिर्फ इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि विधि द्वारा कौन सा कानून बनाकर किसी के अधिकारों को सुनिश्चित किया जा रहा है बल्कि उन स्थितियों पर ज्यादा विचार करना चाहिए जिसके आधार पर मानवाधिकार हनन की स्थिति स्पष्ट हुई है और यह स्थिति शरीर के अंदर चलने वाली भाषाएं हैं जो मनुष्य के अंदर उसके अस्तित्व को लेकर पैदा करते हैं यही यही कारण है कि मानवाधिकार के अध्ययन को अधिकार विज्ञान यारा इटोलॉजी के अंतर्गत रखा जाना चाहिए जिसके आधार पर उन वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन किया जाता है जोया स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के अंदर किन-किन रासायनिक क्रियाओं के परिणाम स्वरुप अपने अधिकार को सुनिश्चित करने की स्थिति पैदा होती है या स्थिति प्राकृतिक विरोध का भी परिणाम हो सकती है और राज्य के विरुद्ध विरोध का भी परिणाम हो सकती है इसीलिए मानवाधिकार को वैज्ञानिक आधार पर समझने की आज ज्यादा आवश्यकता है

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