
स्वाधीनता दिवस के पहले विभाजन विभीषिका दिवस आयोजन की परम्परागत नरेंद्र मोदी ने शुरू की. इसके माध्यम से जन जागरुकता का संदेश दिया जाता है. देश ने स्वाधीनता से पहले विभाजन की त्रासदी झेली थी. ऐसी स्थिति फिर कभी देश को ना देखनी पड़े, इसके लिए सजग रहने की आवश्यकता है. विभाजनकारी तत्वों का मुकाबला करना होगा. उनके मंसूबों को विफल करना होगा. आजादी के अमृत महोत्सव का भी यही संदेश रहा है. अमृत महोत्सव का शुभारंभ स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्ष को ध्यान में रख कर किया गया था।इसके अंतर्गत स्वतंत्रता संग्राम के प्रसंगों से नई पीढ़ी को अवगत कराने का लक्ष्य बनाया गया है। बड़ी संख्या में प्रसंग उपेक्षित थे। इनकी जानकारी देने का भी सफलता पूर्वक प्रयास किया गया। यह अमृत महोत्सव का पहला चरण था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी दूरदृष्टि से इसको व्यापक बना दिया। इसमें आत्मनिर्भर भारत और विकास के अनेक पहलू भी सम्मिलित हो गए। यह संदेश देने का प्रयास हुआ कि पचहत्तर वर्षों मे देश समग्र विकास की दिशा में अग्रसर है। डिजीटल इंडिया अभियान के अंतर्गत व्यवस्था में व्यापक सुधार किया गया। डिजीटल इण्डिया अभियान वन नेशन वन एप्लीकेशन के माध्यम से चरितार्थ हो रहा है। डिजिटल इण्डिया के माध्यम से शासन की योजनाओं का लाभ आमजन तक पहुंचने लगा है। सरकार द्वारा समाज के अन्तिम पायदान तक के लोगों को शासन की योजनाओं से जोड़ने का कार्य किया गया। आगामी पच्चीस वर्ष के लक्ष्य निर्धारण का अमृत काल भी है। एक भारत श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना साकार हो रही है. स्वस्थ व संवैधानिक प्रजातंत्र के मामले में भारत ने सर्वश्रेष्ठ मुकाम बनाया है। भारत जैसी विविधता इनमें से किसी देश में नहीं है।
विश्व में कहीं भी जब अहिंसा, स्वतंत्रता, मानवता, सौहार्द, स्वच्छता, गरीबों की भलाई आदि का प्रसंग उठता है, तब महात्मा गांधी का स्मरण किया जाता है। भारत को स्वंतंत्र कराने में उन्होंने अपना जीवन लगा दिया। फिर भी वह अंग्रेजों से नहीं उनके शासन से घृणा करते थे, उनके शासन की भारत से समाप्ति चाहते थे। यह उनका मानवतावादी चिंतन था। वह पीर पराई को समझते थे। उसका निदान चाहते थे। इन्हीं गुणों ने उन्हें विश्व मानव के रूप में प्रतिष्ठित किया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने सत्रह प्रस्तावों को घोषणा की थी। इनके मूल में गांधीवाद की ही प्रतिध्वनि थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों की जानकारी भी देने और अमल का संकल्प व्यक्त करने का भी अभूतपूर्व अवसर मिला. इन प्रस्तावों में गांधी चिंतन की ही झलक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सतत विकास लक्ष्य और उद्देश्य में वह बिंदु समाहित है जिन्हें हासिल करने का गांधी जी ने सदैव प्रयास किया। गरीबों को देखकर ही उन्होंने अपने ऊपर न्यूनतम उपभोग का सिद्धान्त लागू किया था। इससे वह कभी भी विचलित नहीं हुए।
संयुक्त राष्ट्र संघ से सतत विकास प्रस्तावों में गरीबी, भुखमरी, शिक्षा, स्वास्थ्य और खुशहाली, शिक्षा, लैंगिक समानता, जल एवं स्वच्छता, ऊर्जा, आर्थिक वृद्धि और उत्कृष्ट कार्य, बुनियादी सुविधाएं, उद्योग एवं नवाचार, असमानताओं में कमी, संवहनीय शहर, उपभोग एवं उत्पादन, जलवायु कार्रवाई, पारिस्थितिक प्रणालियां, शांति, न्याय, भागीदारी के विषय शामिल है। इनको ध्यान से देखें तो यही गांधी चिंतन के मूल आधार है। वह ऐसा विश्व चाहते थे जिसमें गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बीमारी, असमानता,भुखमरी न हो। इन्हीं पर तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी जोर दिया। गांधी का सपना समता मूलक समाज था। वह विश्व को अधिक संरक्षित बनाना चाहते थे। शांति, न्याय, पर्यावरण संरक्षण को वरीयता देते थे। वह समस्याओं के निराकरण में सबकी भागीदारी चाहते थे। समाज में सक्षम व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह निर्बलों की सहायता करे। अपने को संम्पत्ति का ट्रस्टी समझे। इसी प्रकार धनी देश अविकसित देशों की सहायता करे। गांधी चिंतन की भावना थी कि कोई पीछे न छूटे। संयुक्त राष्ट्र संघ का भी यही विचार है। इस लक्ष्य को हासिल करने का प्रयास करना आवश्यक है। अंत्योदय का मूलमंत्र भी यही है।
इसी के मद्देनजर नरेंद्र मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, जैसी योजनाएं लागू की। इन सतत विकास लक्ष्यों का सीधा संबंध प्रदेश सरकारों से है। सरकार ने सतत विकास के लक्ष्य हासिल करने का मंसूबा दिखाया। उनकी सरकार इस रास्ते पर चल रही है। अमृत महोत्सव की यह व्यापक अवधारणा है। जिसे योगी आदित्यनाथ ने बखूबी समझा और उनको प्रदेश के समग्र विकास से जोड़ कर आगे बढ़ाया।












